न्यायालयसभ सर्वोच्च न्यायालय
मृत्युदंडक फाँसीसँ बेसी मानवीय कोनो सबूत नहि अछि-सर्वोच्च न्यायालय
एहि मामलामे दंड प्रक्रिया संहिता, 1973क धारा 354 (5) क संवैधानिक मान्यताकेँ चुनौती देबाक लेल एकटा जनहित याचिका शामिल अछि, जाहिमे फांसीकेँ मृत्युदण्डक एकमात्र तरीकाक रूपमे निर्धारित कयल गेल अछि।
याचिकाकर्ता तर्क दैत छथि जे ई विधि सम्मानक सङ्ग मरिबाक अधिकारसँ वंचित कऽ संविधानक अनुच्छेद 21क उल्लंघन करैत अछि।
ई कोना चिन्ता करैत अछिः याचिकाकर्ता-ऋषि मल्होत्रा आ उत्तरदाता-भारत संघ; न्यायाधीशः मेहता, जे।
अदालत की फैसला कयलक?
- न्यायालय धारा 354 (5) दंड प्रक्रिया संहिता (आ संबंधित धारा 393 (5) बी. एन. एस. एस.) क संवैधानिक वैधता के चुनौती दैत रिट याचिका पर सुनवाई कयलक।
- अदालत नोट कयलक जे एहि याचिका पर पहिल बेर 6 अक्टूबर, 2017 केँ विचार कयल गेल छल।
- न्यायालयक मत छल जे संवैधानिक दृष्टिकोण स्थिर नहि अछि आ एक बेर बरकरार राखल गेल प्रावधान पर वैज्ञानिक आ सामाजिक विकासक आलोकमे पुनर्विचारक आवश्यकता भऽ सकैत अछि।
- अदालत याचिकाकर्ता के निवेदन दर्ज केलक जे फांसी सँ फांसी देने सँ गरिमा नष्ट भऽ जायत छैक आ दुख के बारे मे बचन सिंह के असहमत राय के उल्लेख केलकै।
- न्यायालय प्रथम दृष्टिसँ विचार कयलक जे विधायिका अनावश्यक पीड़ा आ पीड़ा सँ बचबाक लेल निष्पादनक वैकल्पिक तरीका पर विचार कऽ सकैत अछि।
दस्तावेजमे सेहो
- प्रदान कयल गेल निर्णय पाठकेँ काटल गेल अछि आ एहिमे अंतिम परिचालन आदेश, देल गेल राहत, या याचिका खारिज नहि कयल गेल अछि।
- न्यायालय स्पष्ट रूपसँ कहलनि जे मृत्युदंडक संवैधानिक वैधता स्वयं कानून द्वारा तय कयल गेल अछि आ एहि बहसक विषय नहि अछि, बल्कि निष्पादनक विधि पर ध्यान केंद्रित करैत अछि।
- अदालत दीन बनाम भारत संघमे 1983क फैसलाक सन्दर्भ देलक, जे पहिने फांसीकेँ बरकरार रखलक छल, मुदा उल्लेख कयलक जे तखनसँ तथ्यात्मक आ मानक परिदृश्य बदलि गेल अछि।
ई कोना लिखल गेल छल?
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मूल दस्तावेज
भारतक सर्वोच्च न्यायालय-आदेश आ निर्णयसभ
अदालतक आदेश रेफ. डब्ल्यू. पी. (सी. आर. एल.) नं. 145/2017 · 19 अगस्त 2026
एकरा एतऽ पढ़ू।
चर्चा।
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